निकल नहीं पा रही
वह खंजर जो इधर लगी है
जिन्हें गले लगाया उन्होंने
रंग लिए हाथ और अपने दामन
मेरे खून से
मिट भी जाये खून का
चिप-चिपापन उनके हाथ से
तो दामन से दाग न छूटे कभी
अगर बंद हो गयी मेरी आँखें
तो ता-उम्र उन्हें नींद न आये
जो तड़प इधर है वह कुछ देर
उधर भी रहे ठहर कर
कभी जो वापस गया उनके पास
तो फिर गले ही लगाऊंगा
थोड़ी अपनी टीस दे दूंगा
और उनकी हंसी ले आऊंगा
अबकी जो उनका दिल चाहे
कहूँगा सिने पर ही करना वार
अगर पीठ के जख्मों पर
खंजर लगाया दोस्त बनकर
वह खंजर कैसे निकाल पाउँगा
अबकी जो बरसात आई है
धो देगी मेरे जख्मों को
बरसात के सफ़ेद फूलों को
रंग न मिले, कोई बात नहीं
वह लाल रंग इन्द्रधनुष बनकर
और भी चमक जायेगा
Sunday, February 13, 2011
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