Sunday, August 2, 2009

चाँद और चिराग

हाँ वादा किया था मैंने
लाकर दे दूंगा चाँद
रख लेना अपने दामन में
मगर अभी वक़्त ठीक नही

आजकल वह चाँद दुखी है
चेहरा जर्द है उसका
कहने लगा कल मुझसे
पहले शाम ढलने का
इंतजार करता था सिद्दत से
मगर अब दिल नहीं करता
रोज छींटे पड़ जाते हैं
खून के, तेरी धरती से
दाग हो गए हैं
चाँद के गालों पर

तारे ला दूंगा कहा होगा
इंकार नहीं मुझे
पर इस वक़्त यह ठीक नही
अभी कुछ खुशियाँ है
बाकी तुम्हारे पास

चाँद तारों को
वहीँ छोड़ दो कुछ दिन
धुंधले ही सही
टंगे हुए तो है आसमान में
कुछ रोशनी होने दो
आजकल रोज कुछ घरों के
चिराग बुझ रहे हैं।

पतझड़

फिर से झड़ने लगे हैं पत्ते
हर बार के पतझड़ की
तरह जैसे पिछले साल भी कुछ रिश्ते
ऐसे ही टूट गए थे
अगली सुबह साफ कर दिए जाते
हैं और निशान ही ख़तम इनका

पेड़ को जान बचानी थी
इसलिए गिरा दिया इनको
उस आंसू की तरह
जो रुका था बहुत दिन से
आँखों के कोरों पर

फिर से नए पत्ते आ जायेंगे
मगर निशान तो रह ही जाते हैं
गौर से देखो तो शाखों पर
दोस्त तो फिर से गले मिल जाते हैं
भाई बंट गए वो घर कहाँ मिले
जैसे पास वाली लता को
पेड़ ने कई बार सहारा दिया है
पर टूटे पत्ते टूटी डाली कहाँ जुड़े

कुछ उजड़ा तो लगता है बगीचा
पर देख के नए पत्तों को
कुछ तो आस जगती है
की मौत की आग के पास ही
जिन्दगी की लौ भी जलती है.