Wednesday, April 30, 2008

कुछ बिखरे अरमान

बार बार कुचले जाते रहेंगे अरमान
स्वप्न टूट जायेंगे,पूरे होने से पहले
मथा जाता रहेगा मेरा अस्तित्व
और निकलेंगे उसमे से
पीडा गम के हलाहल
अन्दर ही जला रहे जो मुझे।

फिर से चक्रव्यूह में फँसना
हरेक दरवाजे पर आजमाइश,
मगर असफल और
उन्ही किसी दरवाजे पर
मरा हुआ पाया जाना अगली सुबह
जिनमे प्रवेश किया था

वक़्त रहते सावधान नहीं होने का प्रतिफल.
दोष किसका हैं इसमें ?
परिस्थिति या स्वभाव का.
मुश्किल हैं हरेक बात का जवाब
मृत्यु का कोई जवाब नहीं होता जैसे
सिर्फ प्रश्नचिह्न रह जाते हैं
और ढेर सारे प्रश्नचिह्न चलते हैं
मैयत में जवाब ढूंढने को शायद.

Monday, April 28, 2008

राम-भक्तों से क्षमा याचना सहित....

रावन भक्त हूँ मैं
राम का पुजारी नही
उसकी पूजा क्या करूं ,
जहाँ सुरक्षित नारी नहीं
महल छोड़ कर वन में गए,
मर्यादा पुरूसोतम बन गए
भरत ने भी राज चलाया,
क्या फिर नाकाबिल बन गए ?

अगर पालना हो श्वान शावक
तो उसपर पत्थर न चलाऊं
मृग शावक पर क्यूँ तीर चलाया
यह निर्बुधि समझ न पाऊं
त्रिलोक को पता था
विष्णु लक्ष्मी का अवतार हुआ हैं
त्रिलोक विजेता अनजान,
क्या मूढ़ मति था?
वेदावती से शापित,
नारी स्पर्श से मृत्यु लिखा था
सीता को जबरन लंका ले जाना,
क्या मौत नहीं था ?
लक्ष्मी सीता का स्पर्श किया
यह असत्य हैं
विष्णु के हाथ से मोक्ष मिले,
यही सत्य हैं।

अशोक वन में थी सुरक्षित
या असहाय वन में
वह तो वही जाने क्या था,
पुरुसोत्तम के मन में।
उसकी कामना थी मोक्ष वह पाया
अग्नि के फेरे लिए थे,
सीता के साथ मगर
धोबी बड़ा था या सीता
क्या राम को समझ न आया ?

Sunday, April 20, 2008

हर युग में जायेगी क्या बनवास को सीता

हर युग में जायेगी क्या बनवास को सीता
उसकी होगी अग्नि परीक्षा और पुरुसोत्तम की होगी पूजा ?
लांछन उस रावन पर जिसने माता कहकर मान दिया
महल में न रख कर देवी को
अशोक वाटिका में स्थान दिया

अनपढ़ उस धोबी को पाप
जिसने कहा मैं 'राजा " राम नहीं
की पत्नी बिना एक दिन भी काम चले
सीता तो उस रोज ही मरी थी
जब दुबारा बनवास हुआ था

धरती में कैसे समाती माता
क्या गर्भ हत्या का भी पाप लिखा था ?

आज भी तो मरती है
गर्भ में ही कितनी सीता
तब भी जिंदा घडे में थी
आज भी रख दी जाती है।
या बचकर सहती है
बनवास और 'अग्नि परीक्षा "
पता नहीं कब वह दिन आये
जब जगज्जननी को राजमाता का मान मिलेगा ?
१९ अप्रिल 2008

Saturday, April 19, 2008

दोराहे और जिन्दगी

कभी कंक्रीट के जंगलों के बीच से गुजरना
कभी भूलभुलैया वाली गलियों से
जिनमे जिन्दगी के खो जाने का भय हैं।
एक दुसरे को समकोण पर काटती गलियां
हड़प्पा काल से आज तक वैसी ही हैं
मगर जिन्दगी को सीधा रास्ता इधर से हैं
यह बोर्ड आज तक कहीं नहीं लगा ।
रास्ते खो जाते हैं मंजिलों का क्या?

कभी कभार ऐसे मोड पर जिन्दगी मिल जाती हैं
आश्चर्यचकित ,कुछ बोलने न बोलने के बीच
की परिस्थिति।
और कभी इन्ही दोराहों,चौराहों से रास्ते बंटते हैं
तब मैं कहता हूँ॥ यहाँ से तुम्हारे, मेरे रास्ते अलग हैं
मगर दोनों में से कोई रास्ता जिन्दगी को नहीं जाता
बँटने के बाद कोई चीज़ पूर्ण हुई हैं कभी॥
रास्ता हो या जिन्दगी।
मगर सत्य तो यह हैं की
कभी कभी अस्तित्व बचाने के लिए ही
रास्ते बांटने पड़ते हैं.

Tuesday, April 15, 2008

ऐसे रिश्ते क्यूँ?

ऐसे रिश्ते क्यूँ?
चंद सात फेरों
और कुछ रस्मों का
मोहताज क्यूँ हैं हरेक रिश्ता?
जिस तरह चंद सांसों का मोहताज शरीर
सांसों के धागे का टूटना
जिन्दगी का टूटना हैं
मगर क्या रिश्ते रस्मों के गुलाम हैं?

रिश्तों में भी घुन लग जाते हैं
घावों से भी ज्यादा दयनीय
हाथ लगाओ तो शरीर के गिरने का डर.
अग्नि के फेरे लिए हैं
और अग्नि के साथ ही खत्म होंगे
मगर हरेक रोज तिल तिल कर
जल रहा हैं जो अस्तित्व
उसका क्या?

हरेक रात अपनी ही अर्थी पर सोना जैसे
और सुबह उठ कर सोचना
क्यूँ जिंदा रह गया आज भी ?
जिन्दगी भी क्या?
गुलामी भर?
कहाँ से चले, कहाँ जाना हैं पता नहीं ..

अँधेरे के सिवा कुछ नहीं .
अँधेरा, घोर अँधेरा
तमसो मा ज्योतिर्गमय ..
रोशनी ,रोशनी
हाथ थामो मेरा
ले चलो उस ओर
जहाँ से आ रही हैं
प्यार की सिर्फ एक किरण
रिश्तों की धूप नहीं
जल जायेगा बदन.

कोई रस्म नहीं रिवाज नहीं
किस्तों में गम नहीं
किस्तों में खुशी नहीं
और संबंध किसी संबंध के मोहताज नहीं...

आनंद मिश्रा ...