Tuesday, April 15, 2008

ऐसे रिश्ते क्यूँ?

ऐसे रिश्ते क्यूँ?
चंद सात फेरों
और कुछ रस्मों का
मोहताज क्यूँ हैं हरेक रिश्ता?
जिस तरह चंद सांसों का मोहताज शरीर
सांसों के धागे का टूटना
जिन्दगी का टूटना हैं
मगर क्या रिश्ते रस्मों के गुलाम हैं?

रिश्तों में भी घुन लग जाते हैं
घावों से भी ज्यादा दयनीय
हाथ लगाओ तो शरीर के गिरने का डर.
अग्नि के फेरे लिए हैं
और अग्नि के साथ ही खत्म होंगे
मगर हरेक रोज तिल तिल कर
जल रहा हैं जो अस्तित्व
उसका क्या?

हरेक रात अपनी ही अर्थी पर सोना जैसे
और सुबह उठ कर सोचना
क्यूँ जिंदा रह गया आज भी ?
जिन्दगी भी क्या?
गुलामी भर?
कहाँ से चले, कहाँ जाना हैं पता नहीं ..

अँधेरे के सिवा कुछ नहीं .
अँधेरा, घोर अँधेरा
तमसो मा ज्योतिर्गमय ..
रोशनी ,रोशनी
हाथ थामो मेरा
ले चलो उस ओर
जहाँ से आ रही हैं
प्यार की सिर्फ एक किरण
रिश्तों की धूप नहीं
जल जायेगा बदन.

कोई रस्म नहीं रिवाज नहीं
किस्तों में गम नहीं
किस्तों में खुशी नहीं
और संबंध किसी संबंध के मोहताज नहीं...

आनंद मिश्रा ...

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