Tuesday, August 26, 2008

घर और रिश्ते

जिन्दगी के धूप छाँव में
कुछ पके पकाए रिश्ते
अभी कुछ दिन हुए इन्हें जन्मे
मगर बूढे लगते हैं

कुछ रिश्ते यूँ भी
पास होकर भी सदियों दूर
एक छत के नीचे
फिर भी अनजान जैसे
और कुछ मीलों दूर होकर भी
साँस की दूरी पर हो जैसे
कभी मिले नहीं
पाने की ख़ुशी भी मिली नहीं
और खोने का डर भी

आना जाना लगा ही रहता
है एक सराए हो जैसे
दीवारों पर नाम कुछ ने लिखा
कुछ ने तस्वीर रख ली
और अगली सुबह सब ख़त्म

चूल्हे की आग कभी बुझती नहीं
सबको वही गर्मी
कब दरवाज़ा किसी को रोकता है
चौखट भी कहाँ
किसी को पहचानता है
जिन्दगी हो या घर
रिश्तों का आना जाना तो
लगा ही रहता है

वह चाँद

सारी रात वह चाँद
जलता रहा मेरे साथ
और मैं खडा बालकनी में
देखता रहा की कभी तो
यह सोने जाये और मैं भी

सुबह देखा तो हरी घास
भीगी थी आज भी
यह आंसू हैं इस चाँद के
या उसके जलने से बने
फोडे से निकला पानी हैं
कौन जाने सच क्या हैं
आज रात भी वह आये
तो पूछूँगा शायद बता दे

उसे सारी रात एक पपीहे
ने देख कर गुजारी हैं पेड़
पर मालूम नहीं हैं शायद
मालूम हो जाये तो जरुर
हंसेगा चाँद या मुस्कराएगा
गड्ढे पद जायेंगे उसके गालों में
शायद मुंह भी छुपा ले
काले बादलों के चादर में
फट गयी हैं उसकी चादर
बदल ले अब इस चादर को
और जल्दी छुप कर सो जाये

खिड़की से मेरे कमरे में
आना जरुरी नहीं
मुझे सुबह जाग कर
फिर से उस सूरज के साथ
जलना हैं पूरे दिन
मगर मेरे जलने पर कहीं
शबनम नहीं मिलती अगली सुबह ।

Sunday, July 13, 2008

अब तो बस इन्सान बनाना

कल रात कुछ लोगों ने
गिरा दी एक घर की दीवार
दीवार से लगा एक चूल्हा भी था
माँ ने कहा था अपने बच्चे को
कल जरुर रोटी के साथ दूध देगी
अब वह सपना है न बच्चा
दोनों बुझ गए चूल्हे के साथ
माँ ,बच्चे का तो मजहब था
उस चूल्हे और सपने का मजहब क्या

कुछ रोज पहले उतरी थी डोली जिसकी
उसके ख्वाब ने कल सफ़ेद साडी पहन ली
अगर डाली होगी सिंदूर उसने
उस सिंदूर का तो मजहब होगा
मगर क्या हाथों की मेहदी और आंसू
का भी कोई मजहब होता है ?

जिस बाप ने दी थी नयी किताबें बेटे को
आज वही बाप बेटे के कंधे पर है
जब भी वह खोलेगा किताब
उसमे क्या उसे अक्षर दिखेंगे
जिस खून को देख आया है
वह उस खून का तो मजहब न था

बंद कर देता हूँ अख़बार
पढ़ नहीं पाता ऐसी बातें
बस यही सोचता हूँ कुछ तो भ्रम रहने देते
की ऊपर वाला सब देखता है
जिसके आगे सर झुकाए वह यहीं रहता है
बस यही दुआ है ऊपर वाले
अब जिसे भी धरती पर भेज
उसे हिन्दू बना ,न मुसलमान बनाना
अब तो बस इन्सान बनाना
बस इन्सान बनाना ।
आनंद
१३ जुलाई २००८

Sunday, May 18, 2008

बाल विधवा

माँ मैं यह नहीं पहनूंगी
पापा क्यूँ मेरी शादी कर दी
जब मैं मतलब भी नहीं समझी
अब जब मैं मतलब समझी चूडियों का
तब माँ क्यूँ तोड़ रही हो इन्हें ?
क्यूँ कहती हो मैं विधवा हूँ
तुम कुछ कहती क्यूँ नहीं ?

जिसका चेहरा भी देखा नहीं ठीक से
तुम कहती हो वह मर गया
मुझे चेहरा याद नहीं
तुम कहती हो उसकी याद में जीना धरम हैं ।

क्यूँ अब किसी की
शादी में नहीं जाने देती
पहले पूजा में सबसे आगे बैठी
अब चाची वहाँ जाने भी नहीं देती

माँ मैं अपनी दुनिया खुद बनाउंगी
मेरे दोस्त जो देखते हैं सपने
वह मैं भी देखूंगी
तुम कुछ कहती क्यूँ नहीं ?

मैं यह उजली साडी नहीं पहनूंगी
माँ मैं विधवा नहीं बनूंगी
कुछ कहो न माँ
औरत हो तुम,पर क्यूँ कुछ कहती नहीं

Wednesday, May 14, 2008

जंगल और इंसान

दरवाजे के बाहर भीड़ हैं
दरवाजे के अन्दर सूनापन
चौखट पर ही न मर जाएं ।
बाहर उजाला हैं ,अन्दर अँधेरा ।

खिड़की के बाहर चाँद हैं
दरवाजे के बाहर सूरज ,
मगर अन्दर जो आग है
वह कहाँ बुझे ?
निकलते हैं पूरा शरीर लेकर ,
और आते हैं छीन भीन अस्तित्व
को ढोते हुए कंधे पर
रोज कुचल जाती हैं आत्मा ,
इंसानों के भगदड़ में
कहाँ जाएं ?जंगल के वहशी तो
कंक्रीट के जंगल में आ गए हैं ।

एक रास्ता हैं
जिससे मैं रोज गुजरता हूँ
उसपर के सारे पत्थर मुझे पहचानते हैं
रोज इंतजार करते हैं मेरा ।
घर ला नहीं सकता
और डर हैं किसी दिन रोलर न चल जाये
जिस तरह जंगल के जानवरों को
घर नहीं ला सका और
वहाँ रोलर और बुलडोज़र चल गए
आनंद dec 2007

Wednesday, May 7, 2008

नयी बहू

इतने पानी से
काम चल जायेगा क्या
नयी बहू के पैरों के छाप धोने को
अभी कल ही तो आई थी वह
मेरे ही सामने
पैरों में लाल महावर लगाये
सास खुस थी लक्ष्मी आई हैं
पैरों के छाप से और
बहू की बड़ाई से माहौल रंगीन था
मगर बहू खुद लक्ष्मी थी
लक्ष्मी लायी नहीं थी ।
सास के अरमान टूट गए
माँ बाप ने कहा था आते वक़्त
की सबको खुस रखना
अब वही घर तुम्हारा हैं ।

मगर बहु कुछ लायी नहीं
साथ में अपने गुण के सिवा ।
जैसे खाना तो हो, नमक न हो
यह तो भारी भूल थी ।

फिर वह दिन भी आया
जब सास ने सबके सामने
रोकर बताया
बहु ने गैस खुला छोड़ दिया था ।
लक्ष्मी जैसी बहू थी
सुहागन की मौत मरी हैं
पैरों में महावर भी लगी हैं

काश दादी ने समझाया न होता
की जिस घर में डोली उतरती हैं
उसी घर से अर्थी उठनी चाहिए ।
पैरों के छाप पर पानी डाल देता हूँ
घर मेरा नहीं हैं तो क्या
कम से कम इसकी अब उन्हें जरुरत नहीं ।

Saturday, May 3, 2008

अच्छा हैं मैं पेड़ हूँ

आज वह बूढा पेड़ बहुत उदास है
जिस दोस्त ने उसे लगाया था
दोस्त का भी बचपन था
और पेड़ भी तब नन्हा था
रोज सुबह बच्चा उसे पानी देता था
उससे बातें करता था
पेड़ भी इंतजार करता था
फिर पेड़ भी बड़ा हुआ
और वह लड़का भी
दोनों की टहनियाँ निकली
हरेक सुख दुःख दोनों ने साथ ही देखे
अब भी गर्मी की दोपहरी
दोनों साथ ही बिताते थे
सुख की बातें सुन कर
पेड़ खुश होकर टहनियाँ हिलाता था
और दुःख की बात पर
पत्ते गिरा देता था आंसू की तरह।

अब इस घर में कोई रहता नहीं
सिर्फ बूढा और बूढी
बच्चे अब नहीं रहते
पेड़ की कोई कीमत नहीं उनके लिए
जिसने कभी उन्हें झुला झुलाया हैं
और उनके बच्चों को भी बढ़ते देखा हैं
तीन पीढ़ी गुजर गयी आँखों के सामने
अब डालियाँ भी सूख गयी हैं

आज सुबह से पेड़ हिला ही नहीं है
आज दोस्त ने उसे अकेला छोड़ दिया
बेटे कुल्हारियां चला रहे हैं सूखी डाली पर
पेड़ को दर्द भी नहीं हैं,
अहसास मर गए हैं दर्द के
बचपन में जिसे गले लगाया
आज उसी की डाली में जल जायेगा
दोस्त की सूखी हड्डियाँ और
शरीर अब उसकी अमानत हैं।
अच्छा हैं वह पेड़ है
वरना आज आंसू कहाँ से इतने लाता।

Wednesday, April 30, 2008

कुछ बिखरे अरमान

बार बार कुचले जाते रहेंगे अरमान
स्वप्न टूट जायेंगे,पूरे होने से पहले
मथा जाता रहेगा मेरा अस्तित्व
और निकलेंगे उसमे से
पीडा गम के हलाहल
अन्दर ही जला रहे जो मुझे।

फिर से चक्रव्यूह में फँसना
हरेक दरवाजे पर आजमाइश,
मगर असफल और
उन्ही किसी दरवाजे पर
मरा हुआ पाया जाना अगली सुबह
जिनमे प्रवेश किया था

वक़्त रहते सावधान नहीं होने का प्रतिफल.
दोष किसका हैं इसमें ?
परिस्थिति या स्वभाव का.
मुश्किल हैं हरेक बात का जवाब
मृत्यु का कोई जवाब नहीं होता जैसे
सिर्फ प्रश्नचिह्न रह जाते हैं
और ढेर सारे प्रश्नचिह्न चलते हैं
मैयत में जवाब ढूंढने को शायद.

Monday, April 28, 2008

राम-भक्तों से क्षमा याचना सहित....

रावन भक्त हूँ मैं
राम का पुजारी नही
उसकी पूजा क्या करूं ,
जहाँ सुरक्षित नारी नहीं
महल छोड़ कर वन में गए,
मर्यादा पुरूसोतम बन गए
भरत ने भी राज चलाया,
क्या फिर नाकाबिल बन गए ?

अगर पालना हो श्वान शावक
तो उसपर पत्थर न चलाऊं
मृग शावक पर क्यूँ तीर चलाया
यह निर्बुधि समझ न पाऊं
त्रिलोक को पता था
विष्णु लक्ष्मी का अवतार हुआ हैं
त्रिलोक विजेता अनजान,
क्या मूढ़ मति था?
वेदावती से शापित,
नारी स्पर्श से मृत्यु लिखा था
सीता को जबरन लंका ले जाना,
क्या मौत नहीं था ?
लक्ष्मी सीता का स्पर्श किया
यह असत्य हैं
विष्णु के हाथ से मोक्ष मिले,
यही सत्य हैं।

अशोक वन में थी सुरक्षित
या असहाय वन में
वह तो वही जाने क्या था,
पुरुसोत्तम के मन में।
उसकी कामना थी मोक्ष वह पाया
अग्नि के फेरे लिए थे,
सीता के साथ मगर
धोबी बड़ा था या सीता
क्या राम को समझ न आया ?

Sunday, April 20, 2008

हर युग में जायेगी क्या बनवास को सीता

हर युग में जायेगी क्या बनवास को सीता
उसकी होगी अग्नि परीक्षा और पुरुसोत्तम की होगी पूजा ?
लांछन उस रावन पर जिसने माता कहकर मान दिया
महल में न रख कर देवी को
अशोक वाटिका में स्थान दिया

अनपढ़ उस धोबी को पाप
जिसने कहा मैं 'राजा " राम नहीं
की पत्नी बिना एक दिन भी काम चले
सीता तो उस रोज ही मरी थी
जब दुबारा बनवास हुआ था

धरती में कैसे समाती माता
क्या गर्भ हत्या का भी पाप लिखा था ?

आज भी तो मरती है
गर्भ में ही कितनी सीता
तब भी जिंदा घडे में थी
आज भी रख दी जाती है।
या बचकर सहती है
बनवास और 'अग्नि परीक्षा "
पता नहीं कब वह दिन आये
जब जगज्जननी को राजमाता का मान मिलेगा ?
१९ अप्रिल 2008

Saturday, April 19, 2008

दोराहे और जिन्दगी

कभी कंक्रीट के जंगलों के बीच से गुजरना
कभी भूलभुलैया वाली गलियों से
जिनमे जिन्दगी के खो जाने का भय हैं।
एक दुसरे को समकोण पर काटती गलियां
हड़प्पा काल से आज तक वैसी ही हैं
मगर जिन्दगी को सीधा रास्ता इधर से हैं
यह बोर्ड आज तक कहीं नहीं लगा ।
रास्ते खो जाते हैं मंजिलों का क्या?

कभी कभार ऐसे मोड पर जिन्दगी मिल जाती हैं
आश्चर्यचकित ,कुछ बोलने न बोलने के बीच
की परिस्थिति।
और कभी इन्ही दोराहों,चौराहों से रास्ते बंटते हैं
तब मैं कहता हूँ॥ यहाँ से तुम्हारे, मेरे रास्ते अलग हैं
मगर दोनों में से कोई रास्ता जिन्दगी को नहीं जाता
बँटने के बाद कोई चीज़ पूर्ण हुई हैं कभी॥
रास्ता हो या जिन्दगी।
मगर सत्य तो यह हैं की
कभी कभी अस्तित्व बचाने के लिए ही
रास्ते बांटने पड़ते हैं.

Tuesday, April 15, 2008

ऐसे रिश्ते क्यूँ?

ऐसे रिश्ते क्यूँ?
चंद सात फेरों
और कुछ रस्मों का
मोहताज क्यूँ हैं हरेक रिश्ता?
जिस तरह चंद सांसों का मोहताज शरीर
सांसों के धागे का टूटना
जिन्दगी का टूटना हैं
मगर क्या रिश्ते रस्मों के गुलाम हैं?

रिश्तों में भी घुन लग जाते हैं
घावों से भी ज्यादा दयनीय
हाथ लगाओ तो शरीर के गिरने का डर.
अग्नि के फेरे लिए हैं
और अग्नि के साथ ही खत्म होंगे
मगर हरेक रोज तिल तिल कर
जल रहा हैं जो अस्तित्व
उसका क्या?

हरेक रात अपनी ही अर्थी पर सोना जैसे
और सुबह उठ कर सोचना
क्यूँ जिंदा रह गया आज भी ?
जिन्दगी भी क्या?
गुलामी भर?
कहाँ से चले, कहाँ जाना हैं पता नहीं ..

अँधेरे के सिवा कुछ नहीं .
अँधेरा, घोर अँधेरा
तमसो मा ज्योतिर्गमय ..
रोशनी ,रोशनी
हाथ थामो मेरा
ले चलो उस ओर
जहाँ से आ रही हैं
प्यार की सिर्फ एक किरण
रिश्तों की धूप नहीं
जल जायेगा बदन.

कोई रस्म नहीं रिवाज नहीं
किस्तों में गम नहीं
किस्तों में खुशी नहीं
और संबंध किसी संबंध के मोहताज नहीं...

आनंद मिश्रा ...