Tuesday, August 26, 2008

वह चाँद

सारी रात वह चाँद
जलता रहा मेरे साथ
और मैं खडा बालकनी में
देखता रहा की कभी तो
यह सोने जाये और मैं भी

सुबह देखा तो हरी घास
भीगी थी आज भी
यह आंसू हैं इस चाँद के
या उसके जलने से बने
फोडे से निकला पानी हैं
कौन जाने सच क्या हैं
आज रात भी वह आये
तो पूछूँगा शायद बता दे

उसे सारी रात एक पपीहे
ने देख कर गुजारी हैं पेड़
पर मालूम नहीं हैं शायद
मालूम हो जाये तो जरुर
हंसेगा चाँद या मुस्कराएगा
गड्ढे पद जायेंगे उसके गालों में
शायद मुंह भी छुपा ले
काले बादलों के चादर में
फट गयी हैं उसकी चादर
बदल ले अब इस चादर को
और जल्दी छुप कर सो जाये

खिड़की से मेरे कमरे में
आना जरुरी नहीं
मुझे सुबह जाग कर
फिर से उस सूरज के साथ
जलना हैं पूरे दिन
मगर मेरे जलने पर कहीं
शबनम नहीं मिलती अगली सुबह ।

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