Thursday, March 20, 2014

कुछ बिखरता सा

लेकर जाना था जो टूट कर
बिखरा था इधर चुभने को 
यूँ  ही दो चार बूँद टपकने का 
गम तो कुछ ख़ास नहीं 
कुछ आसरे टिका रहता है 
कुछ कांधे से हट जाती है 
आंसूं का गीलापन था या 
कुछ और कौन तलाशे 

कब तलाशने से सवालों के 
जवाब मिले हैं जिंदगी में 
अच्छा है कुछ सवाल ऐसे ही रह
जाएँ जिंदगी भर 
कुछ भ्रम न टूटें तो ही अच्छा 
कुछ कंधे न सूखे तो ही अच्छा 
कुछ चुभने वालें घाव 
नासूर बन जाएँ तो 
आराम ही मिले 
कम से कम बहाना तो होता है 

शिकायत करने से कब 
सुलझे हैं सवाल 
वह जो  पूछे जाते हैं आँखों से 
जवाब आते आते रह जाते हैं  होठों तक 
और यूँ ही बीत  जाती हैं जिंदगी 

उन बेचैन आँखों और बंद होठों के बीच

Sunday, February 13, 2011

इन्द्रधनुष

निकल नहीं पा रही
वह खंजर जो इधर लगी है
जिन्हें गले लगाया उन्होंने
रंग लिए हाथ और अपने दामन
मेरे खून से

मिट भी जाये खून का
चिप-चिपापन उनके हाथ से
तो दामन से दाग न छूटे कभी
अगर बंद हो गयी मेरी आँखें
तो ता-उम्र उन्हें नींद न आये
जो तड़प इधर है वह कुछ देर
उधर भी रहे ठहर कर

कभी जो वापस गया उनके पास
तो फिर गले ही लगाऊंगा
थोड़ी अपनी टीस दे दूंगा
और उनकी हंसी ले आऊंगा
अबकी जो उनका दिल चाहे
कहूँगा सिने पर ही करना वार
अगर पीठ के जख्मों पर
खंजर लगाया दोस्त बनकर
वह खंजर कैसे निकाल पाउँगा

अबकी जो बरसात आई है
धो देगी मेरे जख्मों को
बरसात के सफ़ेद फूलों को
रंग न मिले, कोई बात नहीं
वह लाल रंग इन्द्रधनुष बनकर
और भी चमक जायेगा

Sunday, August 2, 2009

चाँद और चिराग

हाँ वादा किया था मैंने
लाकर दे दूंगा चाँद
रख लेना अपने दामन में
मगर अभी वक़्त ठीक नही

आजकल वह चाँद दुखी है
चेहरा जर्द है उसका
कहने लगा कल मुझसे
पहले शाम ढलने का
इंतजार करता था सिद्दत से
मगर अब दिल नहीं करता
रोज छींटे पड़ जाते हैं
खून के, तेरी धरती से
दाग हो गए हैं
चाँद के गालों पर

तारे ला दूंगा कहा होगा
इंकार नहीं मुझे
पर इस वक़्त यह ठीक नही
अभी कुछ खुशियाँ है
बाकी तुम्हारे पास

चाँद तारों को
वहीँ छोड़ दो कुछ दिन
धुंधले ही सही
टंगे हुए तो है आसमान में
कुछ रोशनी होने दो
आजकल रोज कुछ घरों के
चिराग बुझ रहे हैं।

पतझड़

फिर से झड़ने लगे हैं पत्ते
हर बार के पतझड़ की
तरह जैसे पिछले साल भी कुछ रिश्ते
ऐसे ही टूट गए थे
अगली सुबह साफ कर दिए जाते
हैं और निशान ही ख़तम इनका

पेड़ को जान बचानी थी
इसलिए गिरा दिया इनको
उस आंसू की तरह
जो रुका था बहुत दिन से
आँखों के कोरों पर

फिर से नए पत्ते आ जायेंगे
मगर निशान तो रह ही जाते हैं
गौर से देखो तो शाखों पर
दोस्त तो फिर से गले मिल जाते हैं
भाई बंट गए वो घर कहाँ मिले
जैसे पास वाली लता को
पेड़ ने कई बार सहारा दिया है
पर टूटे पत्ते टूटी डाली कहाँ जुड़े

कुछ उजड़ा तो लगता है बगीचा
पर देख के नए पत्तों को
कुछ तो आस जगती है
की मौत की आग के पास ही
जिन्दगी की लौ भी जलती है.

Tuesday, August 26, 2008

घर और रिश्ते

जिन्दगी के धूप छाँव में
कुछ पके पकाए रिश्ते
अभी कुछ दिन हुए इन्हें जन्मे
मगर बूढे लगते हैं

कुछ रिश्ते यूँ भी
पास होकर भी सदियों दूर
एक छत के नीचे
फिर भी अनजान जैसे
और कुछ मीलों दूर होकर भी
साँस की दूरी पर हो जैसे
कभी मिले नहीं
पाने की ख़ुशी भी मिली नहीं
और खोने का डर भी

आना जाना लगा ही रहता
है एक सराए हो जैसे
दीवारों पर नाम कुछ ने लिखा
कुछ ने तस्वीर रख ली
और अगली सुबह सब ख़त्म

चूल्हे की आग कभी बुझती नहीं
सबको वही गर्मी
कब दरवाज़ा किसी को रोकता है
चौखट भी कहाँ
किसी को पहचानता है
जिन्दगी हो या घर
रिश्तों का आना जाना तो
लगा ही रहता है

वह चाँद

सारी रात वह चाँद
जलता रहा मेरे साथ
और मैं खडा बालकनी में
देखता रहा की कभी तो
यह सोने जाये और मैं भी

सुबह देखा तो हरी घास
भीगी थी आज भी
यह आंसू हैं इस चाँद के
या उसके जलने से बने
फोडे से निकला पानी हैं
कौन जाने सच क्या हैं
आज रात भी वह आये
तो पूछूँगा शायद बता दे

उसे सारी रात एक पपीहे
ने देख कर गुजारी हैं पेड़
पर मालूम नहीं हैं शायद
मालूम हो जाये तो जरुर
हंसेगा चाँद या मुस्कराएगा
गड्ढे पद जायेंगे उसके गालों में
शायद मुंह भी छुपा ले
काले बादलों के चादर में
फट गयी हैं उसकी चादर
बदल ले अब इस चादर को
और जल्दी छुप कर सो जाये

खिड़की से मेरे कमरे में
आना जरुरी नहीं
मुझे सुबह जाग कर
फिर से उस सूरज के साथ
जलना हैं पूरे दिन
मगर मेरे जलने पर कहीं
शबनम नहीं मिलती अगली सुबह ।

Sunday, July 13, 2008

अब तो बस इन्सान बनाना

कल रात कुछ लोगों ने
गिरा दी एक घर की दीवार
दीवार से लगा एक चूल्हा भी था
माँ ने कहा था अपने बच्चे को
कल जरुर रोटी के साथ दूध देगी
अब वह सपना है न बच्चा
दोनों बुझ गए चूल्हे के साथ
माँ ,बच्चे का तो मजहब था
उस चूल्हे और सपने का मजहब क्या

कुछ रोज पहले उतरी थी डोली जिसकी
उसके ख्वाब ने कल सफ़ेद साडी पहन ली
अगर डाली होगी सिंदूर उसने
उस सिंदूर का तो मजहब होगा
मगर क्या हाथों की मेहदी और आंसू
का भी कोई मजहब होता है ?

जिस बाप ने दी थी नयी किताबें बेटे को
आज वही बाप बेटे के कंधे पर है
जब भी वह खोलेगा किताब
उसमे क्या उसे अक्षर दिखेंगे
जिस खून को देख आया है
वह उस खून का तो मजहब न था

बंद कर देता हूँ अख़बार
पढ़ नहीं पाता ऐसी बातें
बस यही सोचता हूँ कुछ तो भ्रम रहने देते
की ऊपर वाला सब देखता है
जिसके आगे सर झुकाए वह यहीं रहता है
बस यही दुआ है ऊपर वाले
अब जिसे भी धरती पर भेज
उसे हिन्दू बना ,न मुसलमान बनाना
अब तो बस इन्सान बनाना
बस इन्सान बनाना ।
आनंद
१३ जुलाई २००८