Sunday, August 2, 2009

पतझड़

फिर से झड़ने लगे हैं पत्ते
हर बार के पतझड़ की
तरह जैसे पिछले साल भी कुछ रिश्ते
ऐसे ही टूट गए थे
अगली सुबह साफ कर दिए जाते
हैं और निशान ही ख़तम इनका

पेड़ को जान बचानी थी
इसलिए गिरा दिया इनको
उस आंसू की तरह
जो रुका था बहुत दिन से
आँखों के कोरों पर

फिर से नए पत्ते आ जायेंगे
मगर निशान तो रह ही जाते हैं
गौर से देखो तो शाखों पर
दोस्त तो फिर से गले मिल जाते हैं
भाई बंट गए वो घर कहाँ मिले
जैसे पास वाली लता को
पेड़ ने कई बार सहारा दिया है
पर टूटे पत्ते टूटी डाली कहाँ जुड़े

कुछ उजड़ा तो लगता है बगीचा
पर देख के नए पत्तों को
कुछ तो आस जगती है
की मौत की आग के पास ही
जिन्दगी की लौ भी जलती है.

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