लेकर जाना था जो टूट कर
बिखरा था इधर चुभने को
यूँ ही दो चार बूँद टपकने का
गम तो कुछ ख़ास नहीं
कुछ आसरे टिका रहता है
कुछ कांधे से हट जाती है
आंसूं का गीलापन था या
कुछ और कौन तलाशे
कब तलाशने से सवालों के
जवाब मिले हैं जिंदगी में
अच्छा है कुछ सवाल ऐसे ही रह
जाएँ जिंदगी भर
कुछ भ्रम न टूटें तो ही अच्छा
कुछ कंधे न सूखे तो ही अच्छा
कुछ चुभने वालें घाव
नासूर बन जाएँ तो
आराम ही मिले
कम से कम बहाना तो होता है
शिकायत करने से कब
सुलझे हैं सवाल
वह जो पूछे जाते हैं आँखों से
जवाब आते आते रह जाते हैं होठों तक
और यूँ ही बीत जाती हैं जिंदगी
उन बेचैन आँखों और बंद होठों के बीच