Sunday, May 18, 2008

बाल विधवा

माँ मैं यह नहीं पहनूंगी
पापा क्यूँ मेरी शादी कर दी
जब मैं मतलब भी नहीं समझी
अब जब मैं मतलब समझी चूडियों का
तब माँ क्यूँ तोड़ रही हो इन्हें ?
क्यूँ कहती हो मैं विधवा हूँ
तुम कुछ कहती क्यूँ नहीं ?

जिसका चेहरा भी देखा नहीं ठीक से
तुम कहती हो वह मर गया
मुझे चेहरा याद नहीं
तुम कहती हो उसकी याद में जीना धरम हैं ।

क्यूँ अब किसी की
शादी में नहीं जाने देती
पहले पूजा में सबसे आगे बैठी
अब चाची वहाँ जाने भी नहीं देती

माँ मैं अपनी दुनिया खुद बनाउंगी
मेरे दोस्त जो देखते हैं सपने
वह मैं भी देखूंगी
तुम कुछ कहती क्यूँ नहीं ?

मैं यह उजली साडी नहीं पहनूंगी
माँ मैं विधवा नहीं बनूंगी
कुछ कहो न माँ
औरत हो तुम,पर क्यूँ कुछ कहती नहीं

Wednesday, May 14, 2008

जंगल और इंसान

दरवाजे के बाहर भीड़ हैं
दरवाजे के अन्दर सूनापन
चौखट पर ही न मर जाएं ।
बाहर उजाला हैं ,अन्दर अँधेरा ।

खिड़की के बाहर चाँद हैं
दरवाजे के बाहर सूरज ,
मगर अन्दर जो आग है
वह कहाँ बुझे ?
निकलते हैं पूरा शरीर लेकर ,
और आते हैं छीन भीन अस्तित्व
को ढोते हुए कंधे पर
रोज कुचल जाती हैं आत्मा ,
इंसानों के भगदड़ में
कहाँ जाएं ?जंगल के वहशी तो
कंक्रीट के जंगल में आ गए हैं ।

एक रास्ता हैं
जिससे मैं रोज गुजरता हूँ
उसपर के सारे पत्थर मुझे पहचानते हैं
रोज इंतजार करते हैं मेरा ।
घर ला नहीं सकता
और डर हैं किसी दिन रोलर न चल जाये
जिस तरह जंगल के जानवरों को
घर नहीं ला सका और
वहाँ रोलर और बुलडोज़र चल गए
आनंद dec 2007

Wednesday, May 7, 2008

नयी बहू

इतने पानी से
काम चल जायेगा क्या
नयी बहू के पैरों के छाप धोने को
अभी कल ही तो आई थी वह
मेरे ही सामने
पैरों में लाल महावर लगाये
सास खुस थी लक्ष्मी आई हैं
पैरों के छाप से और
बहू की बड़ाई से माहौल रंगीन था
मगर बहू खुद लक्ष्मी थी
लक्ष्मी लायी नहीं थी ।
सास के अरमान टूट गए
माँ बाप ने कहा था आते वक़्त
की सबको खुस रखना
अब वही घर तुम्हारा हैं ।

मगर बहु कुछ लायी नहीं
साथ में अपने गुण के सिवा ।
जैसे खाना तो हो, नमक न हो
यह तो भारी भूल थी ।

फिर वह दिन भी आया
जब सास ने सबके सामने
रोकर बताया
बहु ने गैस खुला छोड़ दिया था ।
लक्ष्मी जैसी बहू थी
सुहागन की मौत मरी हैं
पैरों में महावर भी लगी हैं

काश दादी ने समझाया न होता
की जिस घर में डोली उतरती हैं
उसी घर से अर्थी उठनी चाहिए ।
पैरों के छाप पर पानी डाल देता हूँ
घर मेरा नहीं हैं तो क्या
कम से कम इसकी अब उन्हें जरुरत नहीं ।

Saturday, May 3, 2008

अच्छा हैं मैं पेड़ हूँ

आज वह बूढा पेड़ बहुत उदास है
जिस दोस्त ने उसे लगाया था
दोस्त का भी बचपन था
और पेड़ भी तब नन्हा था
रोज सुबह बच्चा उसे पानी देता था
उससे बातें करता था
पेड़ भी इंतजार करता था
फिर पेड़ भी बड़ा हुआ
और वह लड़का भी
दोनों की टहनियाँ निकली
हरेक सुख दुःख दोनों ने साथ ही देखे
अब भी गर्मी की दोपहरी
दोनों साथ ही बिताते थे
सुख की बातें सुन कर
पेड़ खुश होकर टहनियाँ हिलाता था
और दुःख की बात पर
पत्ते गिरा देता था आंसू की तरह।

अब इस घर में कोई रहता नहीं
सिर्फ बूढा और बूढी
बच्चे अब नहीं रहते
पेड़ की कोई कीमत नहीं उनके लिए
जिसने कभी उन्हें झुला झुलाया हैं
और उनके बच्चों को भी बढ़ते देखा हैं
तीन पीढ़ी गुजर गयी आँखों के सामने
अब डालियाँ भी सूख गयी हैं

आज सुबह से पेड़ हिला ही नहीं है
आज दोस्त ने उसे अकेला छोड़ दिया
बेटे कुल्हारियां चला रहे हैं सूखी डाली पर
पेड़ को दर्द भी नहीं हैं,
अहसास मर गए हैं दर्द के
बचपन में जिसे गले लगाया
आज उसी की डाली में जल जायेगा
दोस्त की सूखी हड्डियाँ और
शरीर अब उसकी अमानत हैं।
अच्छा हैं वह पेड़ है
वरना आज आंसू कहाँ से इतने लाता।