Wednesday, May 14, 2008

जंगल और इंसान

दरवाजे के बाहर भीड़ हैं
दरवाजे के अन्दर सूनापन
चौखट पर ही न मर जाएं ।
बाहर उजाला हैं ,अन्दर अँधेरा ।

खिड़की के बाहर चाँद हैं
दरवाजे के बाहर सूरज ,
मगर अन्दर जो आग है
वह कहाँ बुझे ?
निकलते हैं पूरा शरीर लेकर ,
और आते हैं छीन भीन अस्तित्व
को ढोते हुए कंधे पर
रोज कुचल जाती हैं आत्मा ,
इंसानों के भगदड़ में
कहाँ जाएं ?जंगल के वहशी तो
कंक्रीट के जंगल में आ गए हैं ।

एक रास्ता हैं
जिससे मैं रोज गुजरता हूँ
उसपर के सारे पत्थर मुझे पहचानते हैं
रोज इंतजार करते हैं मेरा ।
घर ला नहीं सकता
और डर हैं किसी दिन रोलर न चल जाये
जिस तरह जंगल के जानवरों को
घर नहीं ला सका और
वहाँ रोलर और बुलडोज़र चल गए
आनंद dec 2007

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