जिन्दगी के धूप छाँव में
कुछ पके पकाए रिश्ते
अभी कुछ दिन हुए इन्हें जन्मे
मगर बूढे लगते हैं
कुछ रिश्ते यूँ भी
पास होकर भी सदियों दूर
एक छत के नीचे
फिर भी अनजान जैसे
और कुछ मीलों दूर होकर भी
साँस की दूरी पर हो जैसे
कभी मिले नहीं
पाने की ख़ुशी भी मिली नहीं
और खोने का डर भी
आना जाना लगा ही रहता
है एक सराए हो जैसे
दीवारों पर नाम कुछ ने लिखा
कुछ ने तस्वीर रख ली
और अगली सुबह सब ख़त्म
चूल्हे की आग कभी बुझती नहीं
सबको वही गर्मी
कब दरवाज़ा किसी को रोकता है
चौखट भी कहाँ
किसी को पहचानता है
जिन्दगी हो या घर
रिश्तों का आना जाना तो
लगा ही रहता है
Tuesday, August 26, 2008
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