Sunday, July 13, 2008

अब तो बस इन्सान बनाना

कल रात कुछ लोगों ने
गिरा दी एक घर की दीवार
दीवार से लगा एक चूल्हा भी था
माँ ने कहा था अपने बच्चे को
कल जरुर रोटी के साथ दूध देगी
अब वह सपना है न बच्चा
दोनों बुझ गए चूल्हे के साथ
माँ ,बच्चे का तो मजहब था
उस चूल्हे और सपने का मजहब क्या

कुछ रोज पहले उतरी थी डोली जिसकी
उसके ख्वाब ने कल सफ़ेद साडी पहन ली
अगर डाली होगी सिंदूर उसने
उस सिंदूर का तो मजहब होगा
मगर क्या हाथों की मेहदी और आंसू
का भी कोई मजहब होता है ?

जिस बाप ने दी थी नयी किताबें बेटे को
आज वही बाप बेटे के कंधे पर है
जब भी वह खोलेगा किताब
उसमे क्या उसे अक्षर दिखेंगे
जिस खून को देख आया है
वह उस खून का तो मजहब न था

बंद कर देता हूँ अख़बार
पढ़ नहीं पाता ऐसी बातें
बस यही सोचता हूँ कुछ तो भ्रम रहने देते
की ऊपर वाला सब देखता है
जिसके आगे सर झुकाए वह यहीं रहता है
बस यही दुआ है ऊपर वाले
अब जिसे भी धरती पर भेज
उसे हिन्दू बना ,न मुसलमान बनाना
अब तो बस इन्सान बनाना
बस इन्सान बनाना ।
आनंद
१३ जुलाई २००८

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