Monday, April 28, 2008

राम-भक्तों से क्षमा याचना सहित....

रावन भक्त हूँ मैं
राम का पुजारी नही
उसकी पूजा क्या करूं ,
जहाँ सुरक्षित नारी नहीं
महल छोड़ कर वन में गए,
मर्यादा पुरूसोतम बन गए
भरत ने भी राज चलाया,
क्या फिर नाकाबिल बन गए ?

अगर पालना हो श्वान शावक
तो उसपर पत्थर न चलाऊं
मृग शावक पर क्यूँ तीर चलाया
यह निर्बुधि समझ न पाऊं
त्रिलोक को पता था
विष्णु लक्ष्मी का अवतार हुआ हैं
त्रिलोक विजेता अनजान,
क्या मूढ़ मति था?
वेदावती से शापित,
नारी स्पर्श से मृत्यु लिखा था
सीता को जबरन लंका ले जाना,
क्या मौत नहीं था ?
लक्ष्मी सीता का स्पर्श किया
यह असत्य हैं
विष्णु के हाथ से मोक्ष मिले,
यही सत्य हैं।

अशोक वन में थी सुरक्षित
या असहाय वन में
वह तो वही जाने क्या था,
पुरुसोत्तम के मन में।
उसकी कामना थी मोक्ष वह पाया
अग्नि के फेरे लिए थे,
सीता के साथ मगर
धोबी बड़ा था या सीता
क्या राम को समझ न आया ?

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