Saturday, April 19, 2008

दोराहे और जिन्दगी

कभी कंक्रीट के जंगलों के बीच से गुजरना
कभी भूलभुलैया वाली गलियों से
जिनमे जिन्दगी के खो जाने का भय हैं।
एक दुसरे को समकोण पर काटती गलियां
हड़प्पा काल से आज तक वैसी ही हैं
मगर जिन्दगी को सीधा रास्ता इधर से हैं
यह बोर्ड आज तक कहीं नहीं लगा ।
रास्ते खो जाते हैं मंजिलों का क्या?

कभी कभार ऐसे मोड पर जिन्दगी मिल जाती हैं
आश्चर्यचकित ,कुछ बोलने न बोलने के बीच
की परिस्थिति।
और कभी इन्ही दोराहों,चौराहों से रास्ते बंटते हैं
तब मैं कहता हूँ॥ यहाँ से तुम्हारे, मेरे रास्ते अलग हैं
मगर दोनों में से कोई रास्ता जिन्दगी को नहीं जाता
बँटने के बाद कोई चीज़ पूर्ण हुई हैं कभी॥
रास्ता हो या जिन्दगी।
मगर सत्य तो यह हैं की
कभी कभी अस्तित्व बचाने के लिए ही
रास्ते बांटने पड़ते हैं.

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