Saturday, May 3, 2008

अच्छा हैं मैं पेड़ हूँ

आज वह बूढा पेड़ बहुत उदास है
जिस दोस्त ने उसे लगाया था
दोस्त का भी बचपन था
और पेड़ भी तब नन्हा था
रोज सुबह बच्चा उसे पानी देता था
उससे बातें करता था
पेड़ भी इंतजार करता था
फिर पेड़ भी बड़ा हुआ
और वह लड़का भी
दोनों की टहनियाँ निकली
हरेक सुख दुःख दोनों ने साथ ही देखे
अब भी गर्मी की दोपहरी
दोनों साथ ही बिताते थे
सुख की बातें सुन कर
पेड़ खुश होकर टहनियाँ हिलाता था
और दुःख की बात पर
पत्ते गिरा देता था आंसू की तरह।

अब इस घर में कोई रहता नहीं
सिर्फ बूढा और बूढी
बच्चे अब नहीं रहते
पेड़ की कोई कीमत नहीं उनके लिए
जिसने कभी उन्हें झुला झुलाया हैं
और उनके बच्चों को भी बढ़ते देखा हैं
तीन पीढ़ी गुजर गयी आँखों के सामने
अब डालियाँ भी सूख गयी हैं

आज सुबह से पेड़ हिला ही नहीं है
आज दोस्त ने उसे अकेला छोड़ दिया
बेटे कुल्हारियां चला रहे हैं सूखी डाली पर
पेड़ को दर्द भी नहीं हैं,
अहसास मर गए हैं दर्द के
बचपन में जिसे गले लगाया
आज उसी की डाली में जल जायेगा
दोस्त की सूखी हड्डियाँ और
शरीर अब उसकी अमानत हैं।
अच्छा हैं वह पेड़ है
वरना आज आंसू कहाँ से इतने लाता।

1 comment:

Unknown said...

utna to karo vriksharopan...jala sake jo tumhara nishpran tan.
i saw this truth here.