Wednesday, May 7, 2008

नयी बहू

इतने पानी से
काम चल जायेगा क्या
नयी बहू के पैरों के छाप धोने को
अभी कल ही तो आई थी वह
मेरे ही सामने
पैरों में लाल महावर लगाये
सास खुस थी लक्ष्मी आई हैं
पैरों के छाप से और
बहू की बड़ाई से माहौल रंगीन था
मगर बहू खुद लक्ष्मी थी
लक्ष्मी लायी नहीं थी ।
सास के अरमान टूट गए
माँ बाप ने कहा था आते वक़्त
की सबको खुस रखना
अब वही घर तुम्हारा हैं ।

मगर बहु कुछ लायी नहीं
साथ में अपने गुण के सिवा ।
जैसे खाना तो हो, नमक न हो
यह तो भारी भूल थी ।

फिर वह दिन भी आया
जब सास ने सबके सामने
रोकर बताया
बहु ने गैस खुला छोड़ दिया था ।
लक्ष्मी जैसी बहू थी
सुहागन की मौत मरी हैं
पैरों में महावर भी लगी हैं

काश दादी ने समझाया न होता
की जिस घर में डोली उतरती हैं
उसी घर से अर्थी उठनी चाहिए ।
पैरों के छाप पर पानी डाल देता हूँ
घर मेरा नहीं हैं तो क्या
कम से कम इसकी अब उन्हें जरुरत नहीं ।

3 comments:

Keerti Vaidya said...

Iam totally speachless....

aap ney wo likh diya jo kabhi meri sister ke saath hua tha.....

ke bahut kadwa sach jise key agey hum aksar aankhey moond apna din nikal dety hai..

god bless u ..

Anonymous said...

sahi kaha......

काश दादी ने समझाया न होता
की जिस घर में डोली उतरती हैं
उसी घर से अर्थी उठनी चाहिए ।

Anonymous said...

aap likhtey rahey shaayad kabhie is samaaj kii aankh khul jaayae . bahut achchaa likha ahen