Wednesday, April 30, 2008

कुछ बिखरे अरमान

बार बार कुचले जाते रहेंगे अरमान
स्वप्न टूट जायेंगे,पूरे होने से पहले
मथा जाता रहेगा मेरा अस्तित्व
और निकलेंगे उसमे से
पीडा गम के हलाहल
अन्दर ही जला रहे जो मुझे।

फिर से चक्रव्यूह में फँसना
हरेक दरवाजे पर आजमाइश,
मगर असफल और
उन्ही किसी दरवाजे पर
मरा हुआ पाया जाना अगली सुबह
जिनमे प्रवेश किया था

वक़्त रहते सावधान नहीं होने का प्रतिफल.
दोष किसका हैं इसमें ?
परिस्थिति या स्वभाव का.
मुश्किल हैं हरेक बात का जवाब
मृत्यु का कोई जवाब नहीं होता जैसे
सिर्फ प्रश्नचिह्न रह जाते हैं
और ढेर सारे प्रश्नचिह्न चलते हैं
मैयत में जवाब ढूंढने को शायद.

1 comment:

अमिताभ मीत said...

अच्छा है भाई. बधाई